कृष्णभक्ति शाखा
श्री बल्लभाचार्य जी - पहले कहा जा चुका है की विक्रम की पंद्रहवी और सोलहवी शताब्दी में वैष्णव धरम का जो आन्दोलन देश के एक छोर से दुसरे छोर तक रहा उसके श्री बल्लभाचार्य जी प्रधान प्रवर्तकों में से थे । आचर्य जी का जन्म संवत १५३५, वैशाख कृष्ण ११ को और गोलोकवास संवत १५८७, आषाढ़ शुक्ल ३ को हुआ। ये वेद शास्त्र में पारंगत विद्वान् थेने केवल निरुपधि निर्गुण ब्रह्म की ही पारमार्थिक सत्ता स्वीकार की थी। बल्लभ ने ब्रम्ह में सब धर्म मने। सारी सृष्टि को उन्होंने लीला के लिए ब्रह्म की आत्म्कृति कहा। अपने को अंशरूप जीवों में बिखराना ब्रह्म की लीला मात्र है। श्रीक्रिशन ही परब्रह्म है जो दिव्य गुणों से संपन्न होकर पुर्सोतम कहलाते है। आनंद का पूर्ण आविर्भाव इसी पुर्सोतम रूप में रहता है, अतः यही श्रेष्ठ रूप है। पुर्सोतम कृष्ण की सब लीला नित्य है।वे अपने भक्तों के लिए व्यापी वैकुण्ठ में अनेक प्रकार की क्रीडाएं करते रहते है। गोलोक इसी व्यापी वैकुंठ का एक खंड है | जिसमे नित्य रूप में यमुना, वृन्दावन,निकुंज इत्यादि सब कुछ है. भगवन की इस नित्यलीला सृष्टि में प्रवेश करना ही जीव की सबसे उत्तम गति है|
१)पुष्टि जीव, जो भगवन के अनुग्रह का ही भरोसा रखते है|
२)मर्यादा जीव, जो वेद की विधियों का अनुसरण करते है|
३)प्रवाह जीव, जो संसार के प्रवाह में पड़े सांसारिक सुखों की प्राप्ति में ही लगे रहते है |
बल्लभाचार्य जी के मुख्य ग्रन्थ ये है -
१)पूर्व मीमांसा भाष्य |
२)उत्तर मीमांसा या भाष्य जो अनुभाष्य के नाम से प्रसिद्ध है |
३)श्रीमद् भागवत की सूक्ष्म टीका तथा सुबोधिनी टीका |
४)तत्वदीप निबंध तथा |
५)सोलह छोटे छोटे प्रकरण ग्रन्थ |इनमे से पूर्व मीमांसा भाष्य का बहुत थोडा सा अंश मिलता है| अणुभाष्य आचार्य जी पूरी न कर सके थे |अतः अंत के डेढ़ अध्याय उनके पुत्र ने पूरा किया |अंत में अपने उपास्य श्रीकृष्ण की जन्मभूमि में जाकर उन्होंने गद्धी स्थापित की और अपने शिष्य पूरनमल खत्री द्वारा गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ जी का बड़ा भरी मंदिर निर्माण कराया |सब सम्प्रदायों के कृष्ण भक्त भगवत् में वर्णित कृष्ण की ब्रजलीला को ही लेकर चले क्योंकि उन्होंने अपनी प्रेम लक्षणा भक्ति के लिया कृष्ण का मधुर ही पर्याप्त समझा | भगवत् धर्म का उदय यद्द्यपि महाभारत काल में ही हो चुका था और अवतारों की भावना देश में बहुत प्राचीन काल से चली आती थी, पर वैष्णव धर्म के साम्प्रदायिक स्वरूप का संगठन दक्षिण में ही हुआ| वैदिक परम्परा के अनुकरण पर पर प्नेक संहिताएँ, उपनिषद सूत्र ग्रन्थ इत्यादि तैयार हुए| श्री मद भगवत् में कृष्ण के मधुर रूप का विशेष वर्णन होने से भक्ति क्षेत्र में गोपियों के ढंग के प्रेम के माधुर्य भाव का रास्ता खुला|
२.सूरदास जी- सूरदास जी का वृत्त चोरासी वैष्णवों की वार्ता में केवल इतना ज्ञात होता है कि ये पहले गोऊघाट पर एक साधु या स्वामी के रूप में रहा करते थे और शिष्य किया करते थे| तुलसीदास के प्रसंग में हम कह आये है कि भक्त लोग कभी कभी किसी ढंग से अपने को अपने इष्ट देव कि कथा के भीतर डालकर उनके चरणों तक अपने पहुँचने कि भावना करते है| तुलसी ने तो अपने कुछ प्रच्छन्न रूप में पहुँचाया है, पर सुर ने प्रकट रूप में|
नन्द जू मेरे मन आनंद भयो,हौं गोवर्धन तें आयो |
तुम्हरे पुत्र भयो, मैं सुनी के अति आतुर उठी धायो |
* * * * * * *
जब तुम मदन मोहन करी टरौं, यह सुनी कै घर जाऊँ|
हौं तौं तेरे घर को ढाढी, सूरदास मेरो नाऊ |
"सूरदास" पर सुर ने जो "सूरसागर सारावली" लिखी है उसमे अपनी अवस्था ६७ वर्ष कही है|एक और ग्रन्थ सूरदास का "साहित्य लहरी" है जिसमे अल्लान्करोबं के उदाहरण प्रस्तुत करने वल्ले कूट पद है|इसका रचना कल सुर ने इस प्रकार वक्त किया है --
मुनि सुनी रसन के रस लेख|
दसन गौरीनन्द को लिखी सुबल संवत लेख|
'साहित्य लहरी ' के अंत में एक पद है जिसमे सुर अपनी वंशपरम्परा देते है| उस पद के अनुसार सुआ पृथ्वीराज के कवि चंदवरदाई के वंशज ब्रह्मभट्ट थे| चाँद कवि के कुल में हरिचंद हुए जिनके ७ पुत्रों में सबसे छोटे सूरजदास या सूरदास थे| शेष ६ भाई जब मुसलमानों से युद्घ करते हुए मरे गए तब अंधे सूरदास बहुत दिनों तक इधर उधर भटकते रहे| एक दिन वे कुँए में गिर पड़े और ६ दिन उसी में पड़े रहे| सातवें दिन कृष्ण भगवन उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें द्रिष्टि दे कर अपना दर्शन दिया भगवन ने कहा की दक्षिण के प्रबल ब्रह्मण कुल के द्वारा शत्रुओं का नाश होगा और तू सब विद्याओं में निपूर्ण होगा| इस पर सूरदास ने वर माँगा की जिन आँखों से मैंने आपका दर्शन किया है उनसे अब और कुछ न देखूं और सदा आपका भजन करूँ|
राधा कृष्ण के प्रेम को लेकर कृष्णभक्ति की जो काव्य परम्परा चली उसमें लीलापक्ष की प्रधानता रही है| उसमे केलि,विलास, रास, मिलन आदि बाहरी बैटन का ही विशेष वर्णन है| प्रेमलीन हृदय की नाना अनुभूतियों की व्यंजना कम है| सूरदास का सबसे मर्मस्पर्शी अंश 'भ्रमरगीत' है जिसमे गोपियों की वचन वक्ता अत्यंत मनोहारिणी है| ऐसा सुन्दर उपालंभ काव्य और कही नहीं मिलता|
३. नन्ददास- ये सूरदास जी के प्रायः समकालीन थे और उनकी गणना अष्टछाप में है| इनका कविता कल सूरदास जी की मृत्यु के पीछे संवत १६२५ में या उसके और आगे तक मन जा सकता है| इनका जीवन वृत्त पूरा पूरा और ठीक ठीक नहीं मिलता| नंददास जी तुलसीदास जी के भाई कहे गए है| इनकी रचना भी बड़ी सरस और मधुर है| इनके सम्बन्ध में ये कहावत प्रसिद्ध है कि 'और कभी गढिया, नंददास जडिया|' इनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक 'रासपंचाध्यायी' है जो रोला छंदों में लिखी है| इसमें जैसा कि नाम से ही प्रकट है, कृष्ण कि रासलीला का अनुप्रसादियुक्त साहित्यिकभाषा में विस्तार के साथ वर्णन है| जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सुर ने स्वाभाविक चलती भाषा का ही अधिक आशय लिया है, अनुप्रास और चुने हुए संस्कृत पदविन्यास आदि कि ओर प्रवृति नहीं दिखाई है, पर नन्द जी में ये बातें पूर्ण रूप से पायी गई है|
भगवत् दशम स्कंध , सिद्धांत पंचाध्यायी , रूपमंजारी, रसमंजरी, मानमंजरी, दानलीला ज्ञानलीला, श्यामसगाई, और सुदामाचरित उनकी अन्य पुस्तकें है| दो ग्रन्थ इनके लिखे ओर कहे जाते है- हितोपदेश ओर नासिकेतपुराण| दो सौ से ऊपर इनके फुटकल पद भी मिले है| जहाँ तक ज्ञात है इनकी चार पुस्तके है|
४.कृष्ण दास- ये भी बल्लभाचार्य के शिष्य ओर अष्ट छाप में थे | चौरासी वैष्णवों कि वार्ता में इनका कुछ वृत्त दिया हुआ है| इन्होने भी ओर सब कृष्णभक्तों के सामान राधाकृष्ण के प्रेम को लेकर श्रृंगार रस के ही पद गए है| जुगालमन चरित नामक इनका एक छोटा सा ग्रन्थ मिलता है| इसके अतिरिक्त इनके बनाये दो ग्रन्थ ओर कहे जाते है - भ्रमरगीत ओर प्रेमतत्व निरूपण | सूरदास ओर नंददास के सामने इनकी कविता साधारण कोटि कि है| इनका कविताकल संवत १६०० के आगे पीछे मन जा सकता है| इनकि कुछ पंक्तियाँ -
तरनि तनया तट आवत है प्रात समय,
कंदुक खेलत देख्यो आनंद को कंदवा||
नूपुर पद कुनित, पीताम्बर कटी बाँधे,
लाल उपरना, सिर मोरन के चंदवा||
५.मीराबाई - ये मेड़तिया के राठौर रतनसिंह कि पुत्री, ओर जोधपुर के बसने वाले प्रसिद्ध राव जोधा जी कि प्रपोत्री थी| इनका जन्म संवत १५७३ में चोकडी नामक एक गाँव में हुआ था ओर विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था|ये आरंभ से ही कृष्ण भक्ति में लीं रहा करती थी| विवाह के उपरांत थोड़े दिनों में ही इनके पति का परलोकवास हो गया|ये प्रायः मंदिर में जाकर श्रीकृष्ण भगवन कि मूर्ति के सामने आनंदमग्न होकर नाचती ओर गाती थी| इन्हें कई बार विष देने का प्रयत्न किया गया, पर भगवन कृपा से विष का कोई प्रभाव इन पर न हुआ| घरवालों के व्यवहार से खिन्न होकर ये द्वारका ओर वृन्दावन के मंदिरों में घूम घूम कर भजन सुनाया करती थी| मीराबाई कि मृत्यु द्वारका में संवत १६०३ में हो चुकी थी| मीराबाई कि उपासना 'माधुर्यभाव ' कि थी अर्थात वे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण कि भावना प्रीतम या पति के रूप में करती है| मीराबाई का नाम भारत के प्रधान भक्तों में है ओर इनका गुणगान नाभा जी, ध्रुवदास , व्यासजी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है| इनके बनाये चार ग्रन्थ कहे जाते है - नरसी जी का मायरा, गीतगोविन्द टीका, रागगोविंद, राग सोरठ के पद| इनका एक पद निचे दिया गया है-
बसों मेरे नैनन में नन्दलाल |
मोहिनी मुरती, संवारी सुरती, नैना बने रसाल|
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, अरुण तिलक दिए भाल ||
अधर सुधारस मुरली राजति, उर बैजंती माल ||
छुद्र्घंतिका कटी तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल ||
मीरा प्रभु संतान सुखदाई, भक्त्बछल गोपाल ||
६. व्यासजी - इनका पूरा नाम हरिराम व्यास था ओर ये ओरछा के रहने वाले शुक्ल ब्राह्मण थे| पहले ये गोंड संप्रदाय के वैष्णव थे, पीछे हितहरिवंश जी के शिष्य होकर राधाबल्लाभ्जी हो गए|इनका काल संवत १६२० के आस पास है| पहले ये संस्कृत के शास्त्रार्थी पंडित थे ओर सदा शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार रहते थे| एक बार वृन्दावन में जाकर गोस्वामी हितहरिवंश जी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा | गोस्वामी जी ने नम्र भाव से यह पद कहा -
यह जो एक मन बहुत ठौर करि कौने सचु पायो |
जहँ तहँ बिपति जार जुवती ज्यूँ प्रगट पिंगला गयो ||
ये श्रीकृष्ण कि बाललीला ओर श्रृंगारलीला में लीं रहे पर भी बीच बीच में संसार पर दृष्टि डाला करते थे| इन्होने तुलसीजी के सामान खेलों, पाखंडियों आदि का भी स्मरण किया और रसखान के अतिरिक्त तत्वनिरुपन में भी प्रवृत हुए है| प्रेम को इन्होने व्यवहार से अलग 'अतन' अर्थात मानसिक या अध्यात्मिक वास्तु कहा है| ज्ञान वैराग्य और भक्ति तीनो पर बहुत- से पद और साखियाँ इनकी मिलती है| इन्होने एक 'रासपंचाध्यायी' भी लिखी है, जिसे लोगों ने भूल से सूरसागर में मिला लिया है|
७. रसखान - ये दिल्ली के एक पठान सरदार थे| इन्होने ने प्रेमवाटिका' में अपने को शाही खानदान का कहा है -
देखि ग़दर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान|
छिनही बादसा बंश कि, ठसक छांडी रसखान ||
इनका रचना काल संवत १६४० के उपरांत ही माना जा सकता है क्यूंकि गोसाई बिट्ठाल्नाथजी का गोलोक्वास संवत १६४३ में हुआ था| प्रेमवाटिका का रचनाकाल संवत १६७१ है |इनकी दो छोटी छोटी पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई है - प्रेमवाटिका और सुजान रसखान| और कृष्ण भक्तों के समान इन्होने ' गीतकाव्य' का आश्रय न लेकर कवित- सवैयों में अपने सचे प्रेम कि व्यंजना कि है|
No comments:
Post a Comment